उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zinda-dili nishana-e-tahqir kis liye

ज़िंदा-दिली निशाना-ए-तहक़ीर किस लिए

زندہ دلی نشانۂ تحقیر کس لیے

शायर: Dagh Niyazi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़िंदा-दिली निशाना-ए-तहक़ीर किस लिए
खिंचती नहीं हयात की तस्वीर किस लिए

शाख़-ए-शजर पे होती तो कुछ और बात थी
मौजों पे आशियाने की ता'मीर किस लिए

क्या तू ने पैरवी-ए-नबी छोड़ दी है अब
बे-फ़ैज़ हो गई तिरी तक़रीर किस लिए

अहल-ए-शुऊ'र जो थे वो पस्ती में खो गए
बे-ढंग लोग पा गए तौक़ीर किस लिए

तूफ़ान का ख़याल है या ज़लज़ले का ख़ौफ़
तेरे लबों पे नाला-ए-शब-गीर किस लिए

मशहूर थीं ज़माने में शीरीं-बयानीयाँ
अब खो गई ज़बान की तासीर किस लिए

ता-सुब्ह तू ने ख़्वाब ही देखा न रात को
फिर पूछता है ख़्वाब की ता'बीर किस लिए

मंज़िल है 'दाग़' सामने अपने क़दम बढ़ाओ
तुम देखते हो जानिब-ए-रह-गीर किस लिए