उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab talak be-KHudi nahin hoti

जब तलक बे-ख़ुदी नहीं होती

جب تلک بے خودی نہیں ہوتی

शायर: Dagh Niyazi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब तलक बे-ख़ुदी नहीं होती
इश्क़ में चाशनी नहीं होती

कोशिशें मैं ने कीं बहुत लेकिन
हादसों में कमी नहीं होती

जब से छोड़ा है उस ने साथ मिरा
दिल को राहत कभी नहीं होती

आप चाहें तो रूठ सकते हैं
हम से तो बे-रुख़ी नहीं होती

हम ने जाँ तक निसार कर डाली
उन को अब भी ख़ुशी नहीं होती

जब न हों हुस्न-ए-यार की बातें
शायरी शायरी नहीं होती

पहले होती थीं बैठ कर बातें
अब मुलाक़ात भी नहीं होती

उन के मिलने से 'दाग़' दिल को मिरे
अब तो कोई ख़ुशी नहीं होती