उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zehn-o-dil mein kuchh na kuchh rishta bhi tha

ज़ेहन-ओ-दिल में कुछ न कुछ रिश्ता भी था

ذہن و دل میں کچھ نہ کچھ رشتہ بھی تھا

शायर: Ummeed Fazli6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ेहन-ओ-दिल में कुछ न कुछ रिश्ता भी था
ऐ मोहब्बत मैं कभी यकजा भी था

मुझ में इक मौसम कभी ऐसा न था
ऐसा मौसम जिस में तू महका भी था

तुझ से मिलने किस तरह हम आए हैं
रास्ते में ख़ून का दरिया भी था

कज-कुलाहों पर कहाँ मुमकिन सितम
हाँ मगर उस ने मुझे चाहा भी था

आज ख़ुद साया-तलब है वक़्त से
ये वही घर है कि जो साया भी था

जाने किस सहरा-ए-ग़म में खो गया
हाए वो आँसू कि जो दरिया भी था