उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hae ek shaKHs jise humne bhulaya bhi nahin

हाए इक शख़्स जिसे हम ने भुलाया भी नहीं

ہائے اک شخص جسے ہم نے بھلایا بھی نہیں

शायर: Ummeed Fazli7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हाए इक शख़्स जिसे हम ने भुलाया भी नहीं
याद आने की तरह याद वो आया भी नहीं

जाने किस मोड़ पे ले आई हमें तेरी तलब
सर पे सूरज भी नहीं राह में साया भी नहीं

वज्ह-ए-रुस्वाई-ए-एहसास हुआ है क्या क्या
हाए वो लफ़्ज़ जो लब तक मिरे आया भी नहीं

ऐ मोहब्बत ये सितम क्या कि जुदा हूँ ख़ुद से
कोई ऐसा मिरे नज़दीक तो आया भी नहीं

या हमें ज़ुल्फ़ के साए ही में नींद आती थी
या मयस्सर किसी दीवार का साया भी नहीं

बार-हा दिल तिरी क़ुर्बत से धड़क उट्ठा है
गो अभी वक़्त मोहब्बत में वो आया भी नहीं

आप उस शख़्स को क्या कहिए कि जिस ने 'उम्मीद'
ग़म दिया ग़म को दिल-आज़ार बनाया भी नहीं