उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aql ne hum ko yun bhaTkaya rah na sake diwane bhi

अक़्ल ने हम को यूँ भटकाया रह न सके दीवाने भी

عقل نے ہم کو یوں بھٹکایا رہ نہ سکے دیوانے بھی

शायर: Ummeed Fazli6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अक़्ल ने हम को यूँ भटकाया रह न सके दीवाने भी
आबादी को ढूँडने निकले खो बैठे वीराने भी

चश्म-ए-साक़ी भी नम है लौ देते हैं पैमाने भी
तिश्ना-लबी के सैल-ए-तपाँ से बच न सके मयख़ाने भी

संग-ए-जफ़ा को ख़ुश-ख़बरी दो मुज़्दा दो ज़ंजीरों को
शहर-ए-ख़िरद में आ पहुँचे हैं हम जैसे दीवाने भी

हम ने जब जिस दोस्त को भी आईना दिखाया माज़ी का
हैराँ हो कर अक्स ने पूछा आप मुझे पहचाने भी

जिस्म की तिश्ना-सामानी से जिस्म ही ना-आसूदा नहीं
टूट गए इस ज़द पर आ कर रूह के ताने-बाने भी

अंदेशे और बज़्म-ए-जानाँ दार का ज़िक्र और इतना सुकूत
दीवानों के भेस में शायद आ पहुँचे फ़रज़ाने भी