उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zara si baat pe kaTte hain sar hamari taraf

ज़रा सी बात पे कटते हैं सर हमारी तरफ़

ذرا سی بات پہ کٹتے ہیں سر ہماری طرف

शायर: Tahir Faraz5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़रा सी बात पे कटते हैं सर हमारी तरफ़
भला इसी में है तू रुख़ न कर हमारी तरफ़

नए समाज की ता'मीर खा गई उन को
बने हुए थे जो छप्पर के घर हमारी तरफ़

पुराने अह्द के क़िस्से सुनाता रहता है
बचा हुआ है जो बूढ़ा शजर हमारी तरफ़

कनी वो चाट के हीरे की हो गया पत्थर
जब आ गया कोई आईना-गर हमारी तरफ़

न बात समझें न लहजे का दर्द पहचानें
हैं इस नज़र के भी अहल-ए-नज़र हमारी तरफ़