उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ajib hum hain sabab ke baghair chahte hain

अजीब हम हैं सबब के बग़ैर चाहते हैं

عجیب ہم ہیں سبب کے بغیر چاہتے ہیں

शायर: Tahir Faraz7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अजीब हम हैं सबब के बग़ैर चाहते हैं
तुम्हें तुम्हारी तलब के बग़ैर चाहते हैं

फ़क़ीर वो हैं जो अल्लाह तेरे बंदों को
हर इम्तियाज़-ए-नसब के बग़ैर चाहते हैं

मज़ा तो ये है उन्हें भी नवाज़ता है रब
जो इस जहान को रब के बग़ैर चाहते हैं

नहीं है खेल कोई उन से गुफ़्तुगू करना
सुख़न वो जुम्बिश-ए-लब के बग़ैर चाहते हैं

ठठुरती रात में चादर भी जिन के पास नहीं
वो दिन निकालना शब के बग़ैर चाहते हैं

जमी है गर्द सियासत की जिन के ज़ेहनों पर
मुशाएरा भी अदब के बग़ैर चाहते हैं

है ए'तिमाद उन्हें ख़ुद पर ग़ुरूर की हद तक
अकेले जीना जो सब के बग़ैर चाहते हैं