उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zamana aankh se ojhal makan samne hai

ज़माना आँख से ओझल मकान सामने है

زمانہ آنکھ سے اوجھل مکان سامنے ہے

शायर: Idris Azad8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़माना आँख से ओझल मकान सामने है
छिपी हुई है हक़ीक़त गुमान सामने है

निगाह उलझी हुई है वहीं मगर दिल के
खुली ज़मीन खुला आसमान सामने है

खड़ा है तान के वो अब्रूओं की शमशीरें
इधर ये जान मिरी ना-तवान सामने है

करूँगा रोज़े का इज़हार किस तरह तुम पर
नमाज़ का तो जबीं पर निशान सामने है

झुकाऊँ सर तो ज़मीं खींचती है सू-ए-पताल
उठाऊँ सर को तो सारा जहान सामने है

रुका हुआ वो कोई कारवान सामने है
वो चल के ठहर गया है चटान सामने है

मिरे वजूद को जुम्बिश का इख़्तियार नहीं
तुम्हारी आँखों का आईना-दान सामने है

मैं इश्तिहा की अज़िय्यत में हूँ न खींच मुझे
अभी है तूर बहुत दूर नान सामने है