उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zad-e-rah mukammal hai

ज़ाद-ए-रह मुकम्मल है

زاد رہ مکمل ہے

शायर: Nadeem Asghar10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ाद-ए-रह मुकम्मल है
हौसला मुकम्मल है

ख़्वाब मर चुके हैं सब
सानेहा मुकम्मल है

इश्क़ जो किया तुम से
बा-ख़ुदा मुकम्मल है

तुम कहो जो कहना है
तख़लिया मुकम्मल है

अब कहीं न भटकूँगा
ये ख़ुदा मुकम्मल है

माँ ने हाथ उठाए हैं
ये दुआ मुकम्मल है

तुम ने जो सुनाई है
बात क्या मुकम्मल है

अब किसी को क्या देखूँ
दिल दिया मुकम्मल है

उस की आँख कहती है
शाएरा मुकम्मल है

एक बोसा काफ़ी है
नाश्ता मुकम्मल है