उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yun riya aam hui hai ki rawa lagti hai

यूँ रिया 'आम हुई है कि रवा लगती है

یوں ریا عام ہوئی ہے کہ روا لگتی ہے

शायर: Gauhar Hoshiyarpuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यूँ रिया 'आम हुई है कि रवा लगती है
तल्ख़ सी बात सही बात ख़ुदा लगती है

हमा-तशहीर हुआ अब मिरा गुम-सुम रहना
शायद अब मेरी ख़मोशी भी सदा लगती है

वही रेशम से सुबुक हाथ वही फूल सा जिस्म
वही सूरत है जहाँ आँख ज़रा लगती है

पा के ख़ुश भी नहीं कुछ खो के परेशाँ भी नहीं
आरज़ू 'इश्क़ में राज़ी-ब-रज़ा लगती है

ग़म-ए-दूरी भी गया लुत्फ़-ए-हुज़ूरी भी गया
बे-हिसी दिल की 'अजब आज सिवा लगती है

फिर जुनूँ शहर में ता'ज़ीर-तलब है 'गौहर'
निगह-ए-ख़ल्क़ फिर अंगुश्त-नुमा लगती है