उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye shab o roz jo ek be-kali rakkhi hui hai

ये शब ओ रोज़ जो इक बे-कली रक्खी हुई है

یہ شب و روز جو اک بے کلی رکھی ہوئی ہے

शायर: Jaleel 'Aali'7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये शब ओ रोज़ जो इक बे-कली रक्खी हुई है
जाने किस हुस्न की दीवानगी रक्खी हुई है

वो जो इक मौज-ऐ-मोहब्बत तिरे रुख़ पर झलकी
आँख में आज भी उस की नमी रक्खी हुई है

वक़्त देता है जो पहचान तो ये देखता है
किस ने किस दर्द में दिल की ख़ुशी रक्खी हुई है

आती रहती हैं अजब अक्स ओ सदा की लहरें
मेरे हिस्से की कहीं शाइरी रक्खी हुई है

दश्त की चुप से उभरती हैं सदाएँ क्या क्या
बहर के शोर में क्या ख़ामुशी रक्खी हुई है

कोई धुन है पस-ए-इज़हार सफ़र में जिस ने
मेरी ग़ज़लों की फ़ज़ा और सी रक्खी हुई है

कम कहा और सुझाया है ज़्यादा 'आली'
एक इक सत्र में इक अन-कही रक्खी हुई है