उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ajab asbab karta ja raha hun

'अजब अस्बाब करता जा रहा हूँ

عجب اسباب کرتا جا رہا ہوں

शायर: Jaleel 'Aali'7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'अजब अस्बाब करता जा रहा हूँ
लहू सीमाब करता जा रहा हूँ

मैं अपनी मौज में इक रक़्स-ए-दीगर
सर-ए-गिर्दाब करता जा रहा हूँ

अज़ल से जागती आँखों जहाँ में
बसर इक ख़्वाब करता जा रहा हूँ

सर-ए-मिज़्गाँ उभरता है जो तारा
उसे महताब करता जा रहा हूँ

जो दिल इक 'उम्र से बंजर पड़े थे
उन्हें सैराब करता जा रहा हूँ

मैं राह-ए-शौक़ की हर कंकरी को
दुर-ए-नायाब करता जा रहा हूँ

वो एजाज़-ए-सुख़न बख़्शा है उस ने
चटानें आब करता जा रहा हूँ