उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye sach hai un mein ye baaten to han hain

ये सच है उन में ये बातें तो हाँ हैं

یہ سچ ہے ان میں یہ باتیں تو ہاں ہیں

शायर: Faheem Gorakhpuri19 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये सच है उन में ये बातें तो हाँ हैं
बड़े बद-ज़न निहायत बद-गुमाँ हैं

ग़लत है ये वो हम पर मेहरबाँ हैं
कहाँ अपनी समझ है हम कहाँ हैं

न ये पूछें न आए हिज्र में मौत
ख़ुदा भूला है बुत ना-मेहरबाँ हैं

नहीं उठते हैं आ कर ग़ैर हरगिज़
मोहब्बत में यही बार-ए-गराँ हैं

सुबूत-ए-इश्क़ है लब ख़ुश्क सर्द आह
छुपाएँ क्या कि ये सब तो अयाँ हैं

न पूछो बे-ख़ुदी-ए-इश्क़ हम से
ख़बर भी कुछ नहीं है हम कहाँ हैं

वो कुछ समझें सुना दें हाल-ए-दिल तो
यही ना वो निहायत बद-गुमाँ हैं

जब आया नावक-ए-क़ातिल सू-ए-दिल
जिगर ही बोल उट्ठा हम यहाँ हैं

अभी उक्ता गए तुम हज़रत-ए-दिल
मोहब्बत में हज़ारों इम्तिहाँ हैं

हमें बहला के रहते हैं ग़म-ओ-रंज
यही फ़ुर्क़त में गोया मेहरबाँ हैं

न क्यों रश्क आए बख़्त-ए-मुद्दई पर
कि वो उस पर बहुत ही मेहरबाँ हैं

करें किस तरह चाहत उन की हम कम
अभी नाम-ए-ख़ुदा वो नौजवाँ हैं

कभी कर दी थी ज़ाहिर ख़्वाहिश-ए-वस्ल
जभी से तो बहुत वो बद-गुमाँ हैं

हसीनों में नहीं कोई बुराई
मगर इक ऐब ये है बद-ज़बाँ हैं

न क्यों लुत्फ़ आए अब उन के सितम में
सुना है वो शरीक-ए-आसमाँ हैं

कहे देते हैं अब दिल को सँभालो
कि हम आमादा-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ हैं

समझते हैं हमें और ग़ैर को एक
हमारे आप अच्छे क़द्र-दाँ हैं

ज़रा ठहरो जो आए हो दम-ए-नज़अ
कि अब हम कोई दम के मेहमाँ हैं

'फहीम' इतना ही क्या कम है हमें फ़ख़्र
सुनो अहल-ए-ज़बाँ शीरीं-ज़बाँ हैं