उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ban gai dam par yahan abru-e-jaanan dekh kar

बन गई दम पर यहाँ अबरू-ए-जानाँ देख कर

بن گئی دم پر یہاں ابروئے جاناں دیکھ کر

शायर: Faheem Gorakhpuri9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बन गई दम पर यहाँ अबरू-ए-जानाँ देख कर
चौंकता हूँ रात फिर ख़्वाब-ए-परेशाँ देख कर

मैं तो क़ाइल हो गया हूँ रब्त-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ का
वो भी रो देते हैं अक्सर मुझ को गिर्यां देख कर

ख़ाकसारान-ए-मोहब्बत से कोई सीखे अदब
झुक गए सज्दे में नक़्श-ए-पा-ए-जानाँ देख कर

वो अभी पहलू में हैं ये अश्क-बारी क्या ज़रूर
कुछ ज़रा मौक़ा महल ऐ चश्म-ए-गिर्यां देख कर

ख़ंदा-ए-गुल पर मुझे अब किस तरह रोना न आए
हँसते हैं वो बाग़ में बुलबुल को नालाँ देख कर

इस क़दर जोश-ए-जुनूँ में ख़्वाहिश-ए-ईज़ा मुझे
तलवे खुजलाने लगे ख़ार-ए-मुग़ीलाँ देख कर

तौबा करने को तो कर ली लेकिन इस को क्या करूँ
डगमगा जाती है निय्यत अब्र-ए-बाराँ देख कर

वक़्त-ए-बारिश अब्र में बिजली चमकती है ज़रूर
क्यों न हँस दे वो सितम-गर मुझ को गिर्यां देख कर

हम क़यामत को भला कब मानते लेकिन 'फहीम'
आज क़ाइल हो गए रफ़्तार-ए-जानाँ देख कर