उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye raaz koi jaanne wala bhi nahin hai

ये राज़ कोई जानने वाला भी नहीं है

یہ راز کوئی جاننے والا بھی نہیں ہے

शायर: Hafiz Karnataki5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये राज़ कोई जानने वाला भी नहीं है
सूरज की विरासत में उजाला भी नहीं है

सौ रस्ते कमाने के नज़र आते हैं लेकिन
खाने के लिए एक निवाला भी नहीं है

लब नाम तिरा लेने से कतराने लगे हैं
हालाँकि तुझे दिल से निकाला भी नहीं है

क्यों सुर्ख़ हुआ है ये फ़लक आज सर-ए-शाम
मैं ने तो लहू अपना उछाला भी नहीं है

वो लफ़्ज़ हूँ मैं जो न अदा हो सका 'हाफ़िज़'
वो बात हूँ मैं जिस का हवाला भी नहीं है