उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye mai-KHana bara-e-mai-kashan hota to kya hota

ये मय-ख़ाना बरा-ए-मय-कशाँ होता तो क्या होता

یہ مے خانہ برائے مے کشاں ہوتا تو کیا ہوتا

शायर: Hafizullah Khan Badr6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये मय-ख़ाना बरा-ए-मय-कशाँ होता तो क्या होता
उन्हीं के वास्ते पीर-ए-मुग़ाँ होता तो क्या होता

लुटा दी दौलत-ए-होश-ओ-ख़िरद तो मुद्द'आ पाया
हमें अंदेशा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ होता तो क्या होता

हमें तो आज़माया तुम ने और साबित-क़दम पाया
रक़ीब-ए-रू-सियह का इम्तिहाँ होता तो क्या होता

सरापा ज़ीनत-ए-बज़्म-ए-रक़ीबाँ बन के बैठे हो
कभी ऐसा बरा-ए-स्ताँ होता तो क्या होता

न 'क़ैसर' है न 'कैफ़ी' है न 'आसी' है न 'शाएक' है
कोई अब शाइ'र-ए-शो'ला-बयाँ होता तो क्या होता

बिसात-ए-आशियाँ क्या बर्क़ ये तो चार तिनके हैं
तिरी ज़द में प सारा गुलसिताँ होता तो क्या होता