उर्दू शायरी · ग़ज़ल

maujon mein maza aata ho jise girdab se larzan kya hoga

मौजों में मज़ा आता हो जिसे गिर्दाब से लर्ज़ां क्या होगा

موجوں میں مزہ آتا ہو جسے گرداب سے لرزاں کیا ہوگا

शायर: Hafizullah Khan Badr8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मौजों में मज़ा आता हो जिसे गिर्दाब से लर्ज़ां क्या होगा
जो बंदा-ए-साहिल बन के रहे लज़्ज़त-ए-कश-ए-तूफ़ाँ क्या होगा

जो उम्र कटे बे-कैफ़ी में बे-लुत्फ़ी में बे-रंगी में
उस क़िस्से की सुर्ख़ी क्या होगी उस ज़ीस्त का उनवाँ क्या होगा

रूदाद-ए-क़फ़स क्या ख़ाक कहें जब तक भी रहे ये फ़िक्र रही
अंजाम-ए-नशेमन क्या होगा अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा

है अपना जुनून-ए-इश्क़-फ़ज़ा हर क़ैद-ए-मकाँ से बाला-तर
मम्नून-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा पाबंद-ए-बयाबाँ क्या होगा

बेगाना-ए-बीम-ओ-रजा हो कर तक़दीर बनाएँ आप अपनी
ये फ़िक्र दलील-ए-पस्ती है अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा

वाँ ज़िद है कि बे-माँगे न मिले याँ हुस्न-ए-तलब भी है बिदअ'त
रहमत के लिए भी शर्तें हों तो अफ़्व का अरमाँ क्या होगा

ये तर्ज़-ए-जहाँ ये ख़ून-ए-वफ़ा ये हम-नफ़सों की बे-मेहरी
तकमील-ए-तमन्ना हो न सकी तो ज़ीस्त का सामाँ क्या होगा

रंगीन जवानी ही कब थी ख़ैर अब तो बुढ़ापा आया है
चालीस के पेठे में आख़िर अब 'बद्र' ग़ज़ल-ख़्वाँ क्या होगा