उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na ye zamin hai apni na aasman apna

न ये ज़मीन है अपनी न आसमाँ अपना

نہ یہ زمین ہے اپنی نہ آسماں اپنا

शायर: Hafizullah Khan Badr5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न ये ज़मीन है अपनी न आसमाँ अपना
अलग बनाएँ हम अपने लिए जहाँ अपना

ख़याल-ए-शिकवा-ए-ज़िंदाँ किसे ऐ बाद-ए-चमन
नहीं बहार से कम मौसम-ए-ख़िज़ाँ अपना

चमन का लुत्फ़ ही क्या जब कि बाल-ओ-पर न रहे
बना लिया है क़फ़स ही को आशियाँ अपना

हैं सख़्त-जान हम उन की कलाइयाँ नाज़ुक
ये इम्तिहान है उन का कि इम्तिहान अपना

है ज़िंदगी भी यही लुत्फ़-ए-ज़िंदगी भी यही
ख़ुदा करे कि न हो ख़त्म इम्तिहान अपना