उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye ittifaq tha main us ka ham-zamana tha

ये इत्तिफ़ाक़ था मैं उस का हम-ज़माना था

یہ اتفاق تھا میں اس کا ہم زمانہ تھا

शायर: R P Shokh6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये इत्तिफ़ाक़ था मैं उस का हम-ज़माना था
जो ज़िंदगी से तआ'रुफ़ था ग़ाएबाना था

कहीं मिले तो कभी उम्र-ए-रफ़्ता से पूछूँ
कहाँ है आज तिरा जिस से दोस्ताना था

बना के अब मुझे ईंधन जलाए जाता है
यही थी शाख़ कभी जिस पे आशियाना था

कभी जो ज़ो'म हुआ वक़्त रह गया पीछे
नज़र उठाई तो देखा वही ज़माना था

कहाँ थी कोई समाअ'त मकीं वहाँ तो फ़क़त
जबीन-साई की ख़ातिर इक आस्ताना था

कभी ग़ज़ाल सी ख़ू-ए-गुरेज़ ही न गई
थी क़ुर्बतें तो बहुत एक शाख़साना था