उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye fikr-o-fan ke fitne log ab aksar uThate hain

ये फ़िक्र-ओ-फ़न के फ़ित्ने लोग अब अक्सर उठाते हैं

یہ فکر و فن کے فتنے لوگ اب اکثر اٹھاتے ہیں

शायर: Naeem Waqif6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये फ़िक्र-ओ-फ़न के फ़ित्ने लोग अब अक्सर उठाते हैं
उजाले में तो सुब्हा रात में साग़र उठाते हैं

नहीं है ताक़त-ए-परवाज़ लेकिन हौसला तो है
निगाहें आसमाँ पे रख के बाल-ओ-पर उठाते हैं

ये माना हम ने सब्र-ओ-ज़ब्त के आदी हैं हम लेकिन
सितम हद से गुज़र जाए तो फिर ख़ंजर उठाते हैं

कभी ठोकर नहीं खाते वो इस दुनिया-ए-फ़ानी में
जो अपना हर क़दम मौला की मर्ज़ी पर उठाते हैं

हुआ है क़त्ल मुफ़्लिस के दिल-ए-अरमाँ का दुनिया में
तमन्नाएँ थी फूलों की मगर पत्थर उठाते हैं

ज़माने का चलन है इस तरह बदला हुआ 'वाक़िफ़'
झुका के सर जो चलते थे वही अब सर उठाते हैं