उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye bhi mumkin hai miyan aankh bhigone lag jaun

ये भी मुमकिन है मियाँ आँख भिगोने लग जाऊँ

یہ بھی ممکن ہے میاں آنکھ بھگونے لگ جاؤں

शायर: Ejaaz tawakkal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये भी मुमकिन है मियाँ आँख भिगोने लग जाऊँ
वो कहे कैसे हो तुम और मैं रोने लग जाऊँ

ऐ मिरी आँख में ठहराए हुए वस्ल के ख़्वाब
में तवातुर से तिरे साथ न सोने लग जाऊँ

मुझ को हर चीज़ मयस्सर है मोहब्बत में सो अब
राएगानी मैं तिरे दाग़ न धोने लग जाऊँ

इतनी ख़ुश-फ़हमी में नुक़सान न हो जाए कहीं
मैं कोई पाई हुई चीज़ न खोने लग जाऊँ

जा-ब-जा बिखरे हुए हैं मिरे ख़्वाब और ख़याल
मैं ये सामान कहीं और न ढोने लग जाऊँ

झील में पाँव उतारे हैं किसी ने 'एजाज़'
क्यों न अब मैं भी यहाँ हाथ डुबोने लग जाऊँ