उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye alag baat ki fursat bhi nahin milti hai

ये अलग बात कि फ़ुर्सत भी नहीं मिलती है

یہ الگ بات کہ فرصت بھی نہیں ملتی ہے

शायर: Aalam Nizami8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये अलग बात कि फ़ुर्सत भी नहीं मिलती है
ख़ुद से मिल कर हमें राहत भी नहीं मिलती है

हम तो करना भी नहीं चाहते दिल का सौदा
और मुनासिब हमें क़ीमत भी नहीं मिलती है

'इश्क़ वो जुर्म है इस जुर्म को करने वालो
इस के मुजरिम को ज़मानत भी नहीं मिलती है

दौड़ते भी नहीं शोहरत के हम आगे पीछे
और आसानी से शोहरत भी नहीं मिलती है

हर जगह लोग मोहज़्ज़ब भी नहीं होते हैं
हर जगह दोस्तो 'इज़्ज़त भी नहीं मिलती है

हम ने माना कि बुरे आप नहीं हैं लेकिन
आप में कोई शराफ़त भी नहीं मिलती है

ऐश बेटे की कमाई से बहू करती है
माँ को अब दूध की उजरत भी नहीं मिलती है

हर किसी से नहीं रखता हूँ मैं रिश्ता 'आलम'
हर किसी से ये तबी'अत भी नहीं मिलती है