उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apni KHudi ko tum sar-e-bazar bech kar

अपनी ख़ुदी को तुम सर-ए-बाज़ार बेच कर

اپنی خودی کو تم سر بازار بیچ کر

शायर: Aalam Nizami7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अपनी ख़ुदी को तुम सर-ए-बाज़ार बेच कर
ज़िंदा हो कैसे दौलत-ए-किरदार बेच कर

यारब ये क्या 'अज़ाब है नस्ल-ए-जदीद पर
करती है ऐश पुरखों की दस्तार बेच कर

हासिल की उस के बेटे ने कुर्सी मुदीर की
इतना पढ़ाया बाप ने अख़बार बेच कर

उस बद-नसीब बाप की मजबूरियाँ न पूछ
ख़ुशियाँ ख़रीदता है जो घर-बार बेच कर

महँगी बहुत पड़ी मुझे सूरज की दोस्ती
पछता रहा हूँ साया-ए-दीवार बेच कर

जिन को शु’ऊर-ए-बंदगी करता है रब 'अता
जंगल ख़रीद लेते हैं घर-बार बेच कर

'आलम' इसी तरह से जो हम मुंतशिर रहे
खा जाएँगे वतन को ये ग़द्दार बेच कर