उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo tohmaten na lagata to aur kya karta

वो तोहमतें न लगाता तो और क्या करता

وہ تہمتیں نہ لگاتا تو اور کیا کرتا

शायर: Aalam Nizami6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो तोहमतें न लगाता तो और क्या करता
मिरे हुनर न छुपाता तो और क्या करता

खड़ी थीं हर-सू मज़ालिम की आँधियाँ फिर मैं
चराग़-ए-हक़ न जलाता तो और क्या करता

ग़रीबी साथ मिरा दे रही थी बचपन से
न उस का साथ निभाता तो और क्या करता

मैं छाले माँ की हथेली पे देखता कैसे
कमाने शहर न आता तो और क्या करता

तमाम बस्ती परेशाँ थी रौशनी के लिए
मैं अपना घर न जलाता तो और क्या करता

समझ रहा था फ़रिश्ता वो ख़ुद को ऐ 'आलम'
मैं आइना न दिखाता तो और क्या करता