उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo dosti ki jaan se har ek tar khinch kar

वो दोस्ती की जाँ से हर इक तार खींच कर

وہ دوستی کی جاں سے ہر اک تار کھینچ کر

शायर: Ghazala Tabassum5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो दोस्ती की जाँ से हर इक तार खींच कर
मेरा यक़ीन ले गया ग़द्दार खींच कर

दिन मोतियों से हाथ की मुट्ठी में हैं बचे
ये वक़्त ले गया गले से हार खींच कर

हर सम्त भीड़ शोर-शराबा किसे पसंद
ले जाती हैं ज़रूरतें बाज़ार खींच कर

अफ़्साना चल रहा था मगर मौत ले गई
दौरान-ए-ज़िंदगी से ही किरदार खींच कर

बस ख़ामुशी से जंग लड़े जा रहे थे हम
वो लड़ रहे थे लफ़्ज़ की तलवार खींच कर