उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo bar-e-farz-e-takalluf mujhi ko Dhona paDa

वो बार-ए-फ़र्ज़-ए-तकल्लुफ मुझी को ढोना पड़ा

وہ بار فرض تکلف مجھی کو ڈھونا پڑا

शायर: Pallav Mishra5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो बार-ए-फ़र्ज़-ए-तकल्लुफ मुझी को ढोना पड़ा
उसे रुलाने की ख़ातिर मुझे भी रोना पड़ा

वो एक हुस्न था जिस की थी सिर्फ़ ख़्वाब में बूद
उसे जगाने की चाहत में मुझ को सोना पड़ा

मैं देखता हूँ ये छींटे लगेंगे किस के हाथ
मुझे जो आज उदासी से हाथ धोना पड़ा

ये क्या हुआ कि तिरी धुन में जिन से बिछड़े थे
उन्हीं के सामने तुझ से बिछड़ के रोना पड़ा

मैं अपनी मर्ज़ी से इस दुनिया में हुआ कब था
मआ'नी ये हैं कि मुझ को जहाँ में होना पड़ा