उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo aankh de qarib ka saya dikhai de

वो आँख दे क़रीब का साया दिखाई दे

وہ آنکھ دے قریب کا سایہ دکھائی دے

शायर: Usha Bhadoriya9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो आँख दे क़रीब का साया दिखाई दे
आवाज़ रौशनी की कहीं तो सुनाई दे

जिस नाम को जिया है बड़े ए'तिमाद से
उस को भी ज़िंदगी से कभी आश्नाई दे

ऐसा हुआ तो जीने न देंगे किसी को लोग
इंसाँ के हाथ में न मिरे रब ख़ुदाई दे

मैं जानती हूँ पाँव रखे हैं मिरे कहाँ
ख़ुद से करूँ सवाल कोई जब बड़ाई दे

कब तक मैं लम्हा लम्हा जियूँ ख़ुद को भूल कर
इस उम्र-क़ैद से मिरे दिल को रिहाई दे

पत्थर समझ के जिस ने किया दिल को बे-असास
उस को भी आँसुओं की नमी तक रसाई दे

ऐसा न हो कि थक के यक़ीं चूर चूर हो
इतनी तवील अब न दिलों को जुदाई दे

तारीकियों को रख के कहीं खंडरात में
जो लोग पारसा हैं उन्हें पारसाई दे

'ऊषा' जो हाथ रखते नहीं मिरे अक्स पर
इन आइनों को कुछ तो ग़म-ए-ख़ुद-नुमाई दे