उर्दू शायरी · ग़ज़ल

viran paDa hai jo wo ghar dekh raha hun

वीरान पड़ा है जो वो घर देख रहा हूँ

ویران پڑا ہے جو وہ گھر دیکھ رہا ہوں

शायर: Ummaan Husain11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वीरान पड़ा है जो वो घर देख रहा हूँ
जाने का तिरे आज असर देख रहा हूँ

आँगन में तुझे अपने मगर देख रहा हूँ
जैसे कि मैं सहरा में शजर देख रहा हूँ

बुलबुल को है अब क़ैद में जीना ये समझ ले
सय्याद की तिरछी मैं नज़र देख रहा हूँ

हर शाम सर-ए-बाम टहलती है हसीना
बच पाएगा कैसे ये नगर देख रहा हूँ

हैं लोग हज़ारों जो तुझे देख रहे हैं
मैं गुल पे तिरी ठहरी नज़र देख रहा हूँ

दिल तीर से ज़ख़्मी है मगर दर्द नहीं है
क़ातिल की अदा उस का हुनर देख रहा हूँ

तन्हा हूँ सफ़र पर है फ़क़त चाँद का साया
मिल जाए कोई राहगुज़र देख रहा हूँ

जाने से तिरे हाल है अफ़्सुर्दा ये दिल का
सहरा में कभी दश्त में घर देख रहा हूँ

जिस तरह नशे में कोई महबूब को देखे
मैं रात का जागा हूँ सहर देख रहा हूँ

इस 'इश्क़ में मजनूँ की क़बा ओढ़ ली में ने
लैला है किधर और किधर देख रहा हूँ

'उम्मान' ने ग़ज़लों में लिया नाम जो तेरा
है ज़िक्र तिरा अब मैं जिधर देख रहा हूँ