उर्दू शायरी · ग़ज़ल

waraq waraq pe fasana bikharne wala tha

वरक़ वरक़ पे फ़साना बिखरने वाला था

ورق ورق پہ فسانہ بکھرنے والا تھا

शायर: Ehtisham Akhtar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वरक़ वरक़ पे फ़साना बिखरने वाला था
बचा लिया मुझे उस ने मैं मरने वाला था

शगुफ़्ता फूल परेशाँ हुआ तो ग़म न करो
कि वो तो यूँ भी हवा में बिखरने वाला था

मैं उस को देख के फिर कुछ न देख पाऊँगा
ये हादिसा भी मुझी पर गुज़रने वाला था

पहाड़ सीना-सिपर हो गया था मेरे लिए
वगर्ना मुझ में समुंदर उतरने वाला था

मैं बे-क़ुसूर हूँ ये फ़ैसला हुआ वर्ना
मैं अपने जुर्म का इक़रार करने वाला था

उमड पड़ा था जो सैलाब-ए-हिज्र-ए-तन्हाई
वो शहर-ए-दिल को भी ग़र्क़ाब करने वाला था