उर्दू शायरी · ग़ज़ल

go chahta tha bahut par ye mujhse ho na saka

गो चाहता था बहुत पर ये मुझ से हो न सका

گو چاہتا تھا بہت پر یہ مجھ سے ہو نہ سکا

शायर: Ehtisham Akhtar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गो चाहता था बहुत पर ये मुझ से हो न सका
मैं अर्ज़-ए-दिल में मोहब्बत का बीज बो न सका

भँवर में यूँ तो मिरी नाव बारहा आई
मगर हवस का समुंदर मुझे डुबो न सका

सदा-ए-गुम्बद-बे-दर हूँ क़ैद हूँ कब से
मैं अपने आप में कोई सदा समो न सका

मैं माह-ओ-साल के रेशम से नर्म धागे में
तुम्हारी याद के मोती कभी पिरो न सका

बिछड़ते वक़्त वो रोया लिपट के मुझ से बहुत
अजब सितम है कि मैं फिर भी खुल के रो न सका

अजीब शोर उठा था हवस के दरिया में
मगर मैं शोर में आवाज़ अपनी खो न सका

बहुत से यूँ तो मुझे हम-सफ़र मिले 'अख़्तर'
मगर कोई भी मिरे ग़म का बोझ ढो न सका