उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dhup mein jal kar rah hua hun

धूप में जल कर राह हुआ हूँ

دھوپ میں جل کر راہ ہوا ہوں

शायर: Ehtisham Akhtar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

धूप में जल कर राह हुआ हूँ
जब भी पेड़ से मैं टूटा हूँ

बेगानों के देश में कोई
अपने जैसा ढूँड रहा हूँ

दरिया ही में घर है मेरा
फिर भी दरिया से डरता हूँ

अपने ज़ेहन की तहरीरों को
दीमक बन कर चाट रहा हूँ

मुझ को ले कर पछताओगे
मैं तो इक खोटा सिक्का हूँ