उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wahi musafir musafirat ka mujhe qarina sikha raha tha

वही मुसाफ़िर मुसाफ़िरत का मुझे क़रीना सिखा रहा था

وہی مسافر مسافرت کا مجھے قرینہ سکھا رہا تھا

शायर: Jabbar Wasif8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वही मुसाफ़िर मुसाफ़िरत का मुझे क़रीना सिखा रहा था
जो अपनी छागल से अपने घोड़े को आप पानी पिला रहा था

दुखों के गारे में हाथ लिथड़े हुए थे मेरे हुनर के लेकिन
मैं रोते रोते भी मुस्कुराता हुआ कोई बुत बना रहा था

कुछ इस लिए भी मिरी सदा पर हर इक समाअ'त को था भरोसा
गुमाँ के सहरा में बैठ कर मैं यक़ीन के गीत गा रहा था

सुना है कल रात मर गया वो बरहना दरवेश झोंपड़ी में
फ़ना के बिस्तर पे जो बक़ा की हरीस गुदड़ी बिछा रहा था

मिरी नज़र में वो तिफ़्ल मस्जिद के पेशवा से भी मोहतरम है
जो एहतिरामन गली से गंदुम के बिखरे दाने उठा रहा था

बहुत मुक़द्दस थे उस सिपाही की दोनों आँखों के सुर्ख़ डोरे
जो सोई मख़्लूक़ की हिफ़ाज़त में ख़्वाब अपने गँवा रहा था

तमाम शब उस के भूके बच्चों ने जाग कर ही गुज़ार दी थी
ख़ुदी के फ़ुटपाथ पर जो ग़ुर्बत थपक थपक कर सुला रहा था

वो मेरी बरसी पे मेरी मय्यत के नाम शाम-ए-ग़ज़ल थी 'वासिफ़'
मैं अपनी तुर्बत में लेटे लेटे कलाम सब को सुना रहा था