उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wahan hain apni KHud-araiyan hijab nahin

वहाँ हैं अपनी ख़ुद-आराइयाँ हिजाब नहीं

وہاں ہیں اپنی خود آرائیاں حجاب نہیں

शायर: Maharaja Sir Kishan Parashad Shad17 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वहाँ हैं अपनी ख़ुद-आराइयाँ हिजाब नहीं
मक़ाम-ए-जल्वा है पर्दा नहीं नक़ाब नहीं

मैं जिस जहान में हूँ माह-ओ-आफ़्ताब नहीं
तग़य्युरात नहीं कोई इंक़लाब नहीं

हिजाब-ए-अहल-ए-नज़र है फ़रोग़-ए-हुस्न तिरा
जो बे-नक़ाब भी तू है तो बे-नक़ाब नहीं

वो लाख छुपते मगर हम तो देख ही लेते
हमारी आँख जहाँ है वहाँ हिजाब नहीं

मय-ए-मजाज़-ओ-हक़ीक़त का नश्शा हो जिस में
हमारे जाम-ए-सिफ़ाली में वो शराब नहीं

तमाम रात पड़ा करवटें बदलता हूँ
जो मेरे सामने वो चश्म-ए-नीम-ख़्वाब नहीं

लिखे हुए हैं वो सब हाथ से फ़रिश्तों के
मिरे गुनाहों का क्यूँकर कहूँ हिसाब नहीं

बिखेर ज़ुल्फ़-ए-सियह को न रू-ए-रौशन पर
छुपाए अब्र जिसे ये वो आफ़्ताब नहीं

अभी है नाज़ उठाने का हौसला बाक़ी
कि दिल वही है अगर मौसम-ए-शबाब नहीं

ये उन की उठती जवानी की इक हक़ीक़त है
उलट न दे जो क़यामत को वो शबाब नहीं

लगी है कैसी ये चुप तुम को ऐ अदम वालो
किसी सवाल का मेरे कोई जवाब नहीं

नज़र-नवाज़ अदाएँ हैं हुस्न-ए-ख़ुद-बीं की
हया का शाइबा जिन में नहीं हिजाब नहीं

क़दम सँभाल के रख पाएमाल हो न कोई
ज़मीन-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ है फ़र्श-ए-ख़्वाब नहीं

नज़र-फ़रेब है दुनिया-ए-दूँ का नज़्ज़ारा
तिलिस्म-ए-वहम-ओ-गुमाँ है फ़क़त सराब नहीं

अज़ल से वक़्फ़-ए-तग़य्युर निज़ाम-ए-हस्ती है
ज़माना रंग दिखाता है इंक़लाब नहीं

कुछ आज लज़्ज़त-ए-दर्द-ए-जिगर का लुत्फ़ मिला
हुआ सुकून तो क्या कुछ अब इज़्तिराब नहीं

फ़िदा-ए-नाम-ए-मुबारक है 'शाद' सूफ़ी भी
कहे न कोई सना-ख़्वान-ए-बू-तुराब नहीं