उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ai ishq-e-fitna-saman kar de tu hashr barpa

ऐ इश्क़-ए-फ़ित्ना-सामाँ कर दे तू हश्र बरपा

اے عشق فتنہ ساماں کر دے تو حشر برپا

शायर: Maharaja Sir Kishan Parashad Shad7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ऐ इश्क़-ए-फ़ित्ना-सामाँ कर दे तू हश्र बरपा
क्या ये नहीं क़यामत आलम है तेरा शैदा

दैर-ओ-हरम से निकलो गर दीद चाहते हो
पैदा करो बसीरत फिर देख लो तमाशा

ऐ दर्द तेरे क़ुर्बां कैसा मसीह तू है
वो बाइ'स-ए-शिफ़ा है है दर्द नाम जिस का

जिस सम्त देखता हूँ जल्वा तिरा अयाँ है
मेरी नज़र में आलम मज़हर है एक तेरा

इस्म-ओ-सिफ़ात का है तेरे ज़ुहूर हर-सू
इस का यक़ीं है मुझ को है ज़ात तेरी यकता

रंज-ए-ख़ुमार में हूँ अब रहम कर तू मुझ पर
साक़ी पिला दे मुझ को फिर एक जाम-ए-सहबा

बस ध्यान रख तू इस का बस याद रख तू इस की
ऐ 'शाद' दूर रक्खे दिल से तू हुब्ब-ए-दुनिया