उर्दू शायरी · ग़ज़ल

fikr-e-asbab-e-tarab gham ke muqabil ho gaya

फ़िक्र-ए-अस्बाब-ए-तरब ग़म के मुक़ाबिल हो गया

فکر اسباب طرب غم کے مقابل ہو گیا

शायर: Maharaja Sir Kishan Parashad Shad12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फ़िक्र-ए-अस्बाब-ए-तरब ग़म के मुक़ाबिल हो गया
कुल्फ़त-ए-सब्र-आज़मा क्यूँकर मिरा दिल हो गया

ये जो हस्ती है तिरी ये हस्ती-ए-मौहूम है
देख कर दुनिया की नैरंगी को ग़ाफ़िल हो गया

हो गई मुश्ताक़ लज़्ज़त-हा-ए-हसरत मेरी आँख
और कान-ए-ना-उमीदी हैफ़ ये दिल हो गया

तेरे जल्वों की तमन्ना मेरे आँखों को रही
इक निशाना आलम-ए-हैरत का ये दिल हो गया

थी मताअ'-ए-जल्वा अर्ज़ां जबकि तू था जल्वा-गर
जब ख़याल-ए-ग़ैर आया दिल भी ग़ाफ़िल हो गया

जोशिश-ए-फ़स्ल-ए-बहारी थी जवानी यार की
देख कर मैं उस गुल-ए-रा'ना को माइल हो गया

किस तरह जल्वा नज़र आएगा तुझ को ऐ कलीम
दरमियाँ में जब हिजाब-ए-ग़ैर हाइल हो गया

मुद्दआ' महव-ए-तमाशा-ए-शिकस्त-ए-दिल हुआ
आईना-ख़ाने का इक जल्वा मुक़ाबिल हो गया

डूब कर गिर्दाब-ए-ग़म में हो गई हासिल नजात
मौजा-ए-सैलाब-ए-तूफ़ाँ मुझ को साहिल हो गया

परतव-ए-ख़ुर्शीद-ए-आलम-ताब इधर भी इक नज़र
देर क्या है अब तो मैं तेरे मुक़ाबिल हो गया

है मिरा सर ज़ेर-ए-बार-ए-मिन्नत-ए-बेदाद-ए-यार
उस के अल्ताफ़-ओ-इनायत का मैं क़ाएल हो गया

अपनी सूरत ही नज़र आई दुई का ज़िक्र क्या
'शाद' जिस दम आइने के मैं मुक़ाबिल हो गया