उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wafa ki rah mein gul hi nahin hai Khaar bhi hai

वफ़ा की राह में गुल ही नहीं है ख़ार भी है

وفا کی راہ میں گل ہی نہیں ہے خار بھی ہے

शायर: Urooj Qadri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वफ़ा की राह में गुल ही नहीं है ख़ार भी है
ये जुर्म वो है कि पादाश उस की दार भी है

सँभल के आ मिरे हमदम कि राह-ए-इश्क़-ओ-वफ़ा
मक़ाम-ए-सज्दा भी मैदान-ए-कार-ज़ार भी है

मिरे ख़ुदा तिरी रहमत की आस रखता है
तिरा ये बंदा कि ख़ाती भी शर्मसार भी है

ख़िज़ाँ का दौर है घबरा न बुलबुल-ए-ग़मगीं
ख़िज़ाँ के बा'द ही फिर मौसम-ए-बहार भी है

वो वक़्त दूर नहीं है कि फिर तू चहकेगा
कि ख़ारज़ार में पोशीदा लाला-ज़ार भी है

नशे में मस्त हैं जो लोग वो भी ये सुन लें
नशे के बा'द ही आ'ज़ा-शिकन ख़ुमार भी है

ये कारोबार-ए-मोहब्बत भी क्या बला है 'उरूज'
यक़ीं है वा'दा-ख़िलाफ़ी का इंतिज़ार भी है