उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aa gaya waqt ki ho dawat-e-am ai saqi

आ गया वक़्त कि हो दावत-ए-आम ऐ साक़ी

آ گیا وقت کہ ہو دعوت عام اے ساقی

शायर: Urooj Qadri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आ गया वक़्त कि हो दावत-ए-आम ऐ साक़ी
भेज दे चारों तरफ़ अपना पयाम ऐ साक़ी

खींच लाएगा हज़ारों को तिरे पास यहाँ
ये तिरा हुस्न-ए-नज़र हुस्न-ए-कलाम ऐ साक़ी

घर लुटाने की नहीं घर को बचाने की है फ़िक्र
किस क़दर इश्क़ है मेरा अभी ख़ाम ऐ साक़ी

कासा-ए-दिल है तिरे सामने उस को भर दे
मय-ए-अंगूर तो है मुझ पे हराम ऐ साक़ी

उन से बचना है तिरे लुत्फ़-ओ-करम पर मौक़ूफ़
हैं रह-ए-इश्क़ में फैले हुए दाम ऐ साक़ी

कब नए नज़्म से दुनिया को मिलेगी राहत
कितना मोहलिक है ये फ़र्सूदा निज़ाम ऐ साक़ी

दूर गोशे में है उफ़्तादा-ओ-दिल-गीर 'उरूज'
आ कभी उस की तरफ़ बादा-ब-जाम ऐ साक़ी