उर्दू शायरी · ग़ज़ल

uTh is hujum se ai bewafa alahida ho

उठ इस हुजूम से ऐ बेवफ़ा अलाहिदा हो

اٹھ اس ہجوم سے اے بے وفا علاحدہ ہو

शायर: Faisal Imam Rizvi12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उठ इस हुजूम से ऐ बेवफ़ा अलाहिदा हो
मिरा हिसाब चुका दे ज़रा अलाहिदा हो

ये कारवाँ तुझे रस्ते में छोड़ जाएगा
तू अपना क़ाफ़िला बन ख़ाक उड़ा अलाहिदा हो

ये बाग़-ए-हुस्न हमेशा हरा नहीं रहता
बदलने वाली है आब-ओ-हवा अलाहिदा हो

हमारा जुर्म है काला लिबास और मातम
हमारे जुर्म की शायद सज़ा अलाहिदा हो

ये लोग दोस्त नहीं हैं फ़क़त मुनाफ़िक़ हैं
न इन को दाग़-ए-मोहब्बत दिखा अलाहिदा हो

तू ख़ाक-ज़ाद है मिट्टी तिरा ठिकाना है
उतर के तख़्त से मिट्टी पे आ अलाहिदा हो

यहाँ पे सब्ज़ रुतों को अगर बचाना है
अलम का सुर्ख़ फरेरा बना अलाहिदा हो

मैं अपने ग़म की बहारों में मस्त हूँ या-रब
मुझे चमन से न वापस बुला अलाहिदा हो

मिरे करम हैं जले और तिरे करम चमके
हमारा दोनों का शायद ख़ुदा अलाहिदा हो

अगर ज़मीन पे क़ब्ज़ा हुआ तो क्या ग़म है
मिरे ख़याल का कुछ सिलसिला अलाहिदा हो

मुझे ग़ज़ल की तवालत पे ज़ोर देना पड़ा
कि लुत्फ़ और निशाँ रंज का अलाहिदा हो

वो ख़ुद क़तार में बैठा रहा मगर 'फ़ैसल'
मुझे इशारे से कहने लगा अलाहिदा हो