उर्दू शायरी · ग़ज़ल

us sine ki waqat hi kya hai jis sine mein tera nur nahin

उस सीने की वक़अत ही क्या है जिस सीने में तेरा नूर नहीं

اس سینے کی وقعت ہی کیا ہے جس سینے میں تیرا نور نہیں

शायर: Urooj Qadri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उस सीने की वक़अत ही क्या है जिस सीने में तेरा नूर नहीं
उस कासा-ए-सर की क्या क़ीमत जो संग-ए-जुनूँ से चूर नहीं

उस दिल को कोई क्यूँ दिल माने जो जज़्ब-ओ-जुनूँ से ख़ाली हो
उस शम्अ को हम क्यूँ शम्अ कहें जो परतव-ए-शम्अ-ए-तूर नहीं

ये कैफ़-ओ-नशात अफ़ज़ा रातें ये ऐश-ओ-तरब की सौग़ातें
जिस शय के एवज़ में मिलती हैं उस शय का ज़ियाँ मंज़ूर नहीं

मुर्दा भी नहीं ये ज़िंदा है मालिक भी नहीं ये बंदा है
इंसान निराली ख़िल्क़त है मुख़्तार नहीं मजबूर नहीं

इंसान की अज़्मत उस पे फ़िदा इक बंदा-ए-ख़ाकी वो भी था
जो अर्श-ए-इलाही छू आया फिर भी वो ज़रा मग़रूर नहीं

उस जान-ए-जहाँ की ख़ुशनूदी मतलूब-ए-जुनूँ मक़्सूद-ए-सफ़र
सोचो तो ये मंज़िल दूर भी है सोचो तो ये मंज़िल दूर नहीं

हो शौक़-ए-सफ़र तो राह-ए-सफ़र हर सम्त खुली है तेरे लिए
दिल तेरा तलब से ख़ाली है तू वर्ना यहाँ मा'ज़ूर नहीं

हम पर वो ‘उरूज’-ए-ख़स्ता-जिगर तलवार उठाते हैं लेकिन
उस वार से तस्कीं क्या होगी जो वार अभी भरपूर नहीं