उर्दू शायरी · ग़ज़ल

usko dekhun to kabhi main bhi ki wo kaisi hai

उस को देखूँ तो कभी मैं भी कि वो कैसी है

اس کو دیکھوں تو کبھی میں بھی کہ وہ کیسی ہے

शायर: Saba Ikram5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उस को देखूँ तो कभी मैं भी कि वो कैसी है
मेरे पीछे जो 'सबा' घर में मिरे रहती है

जलते साँसों के घने दश्त में जारी है सफ़र
जाँ अभी क़हर के ख़तरों से कहाँ छूटी है

अब कोई ख़्वाबों का झूला भी लगाए तो कहाँ
शब के पेड़ों की हर इक शाख़-ए-हसीं टूटी है

उस के आँगन में खरे नीम की चंचल छाया
शाम से ही मिरी दहलीज़ पे आ बैठी है

गुम हुई है 'सबा' लोहे के पुलों के नीचे
गाँव की शोख़ नदी शहर में जब पहुँची है