उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dasht-e-ehsas mein hum itne akele kab the

दश्त-ए-एहसास में हम इतने अकेले कब थे

دشت احساس میں ہم اتنے اکیلے کب تھے

शायर: Saba Ikram5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दश्त-ए-एहसास में हम इतने अकेले कब थे
दुख तो पहले भी थे पर इतने घनेरे कब थे

हम तो निकले थे हवाओं का मुक़द्दर ले कर
हम किसी मोड़ पे दम लेने को ठहरे कब थे

जैसे अंजान कोई जैसे कोई बेगाना
ख़ुद से कतरा के हम ऐसे भी निकलते कब थे

बुग़्ज़ की धूप से हम भाग के जाते तो कहाँ
शहर-ए-अहबाब में वा दिल के दरीचे कब थे

हर तरफ़ शाख़ों पे लटकी थी 'सबा' ख़ामोशी
रात के पेड़ में आवाज़ के झूले कब थे