उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har pal jo kaTti hai mujhe dhaar hi to hai

हर पल जो काटती है मुझे धार ही तो है

ہر پل جو کاٹتی ہے مجھے دھار ہی تو ہے

शायर: Saba Ikram4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर पल जो काटती है मुझे धार ही तो है
'इकराम' अपनी साँस भी तलवार ही तो है

ऊँची इमारतों के नगर में मिरे लिए
जा-ए-पनाह साया-ए-दीवार ही तो है

हटती है सामने से मिरे कब ये देखिए
अपनी अना भी राह की दीवार ही तो है

रद्दी के भाव बेचने निकले हुए हैं लोग
ये ज़िंदगी पढ़ा हुआ अख़बार ही तो है