उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kab khet umidon ke tah-e-ab na aae

कब खेत उमीदों के तह-ए-आब न आए

کب کھیت امیدوں کے تہہ آب نہ آئے

शायर: Saba Ikram5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कब खेत उमीदों के तह-ए-आब न आए
किस रुत में निराशाओं के सैलाब न आए

कुछ लोग मदद को तो किनारों पे खड़े थे
पर डूबने वाले ही सर-ए-आब न आए

ऐ ज़ीस्त हुए दोस्त मिरे सुर्ख़-रू जिन से
मुझ को तिरी महफ़िल के वो आदाब न आए

इस शहर में शर्मिंदा हर इक दर पे न होते
क्यों हाथों को हम संग तले दाब न आए

डरता हूँ 'सबा' कसरत-ए-बारान-ए-करम से
दिल रेत का घर है कहीं सैलाब न आए