उर्दू शायरी · ग़ज़ल

uqab-e-fikr akela hai barf-zaron mein

उक़ाब-ए-फ़िक्र अकेला है बर्फ़-ज़ारों में

عقاب فکر اکیلا ہے برف زاروں میں

शायर: M Kothiyavi Rahi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उक़ाब-ए-फ़िक्र अकेला है बर्फ़-ज़ारों में
कि चाँद जाड़े का जैसे लरज़ते तारों में

वो आँख नोच दे जिस को भरी बहारों में
लहू का रंग नज़र आए आबशारों में

चला है क़ाफ़िला-ए-आशिक़ाँ कि शोला-रुख़ाँ
दबी दबी सी हैं चिंगारियाँ ग़ुबारों में

सँभल गया मिरा गिरता बदन उठा के तुझे
मैं फिर चला हूँ फिसलते हुए दयारों में

सुकूत-ए-फ़िक्र के 'उनवाँ पे बात चल निकली
इक ऐसा शे'र पढ़ आए हैं शहर-यारों में