उर्दू शायरी · ग़ज़ल

un ko jigar ki justuju unki nazar ko kya karun

उन को जिगर की जुस्तुजू उन की नज़र को क्या करूँ

ان کو جگر کی جستجو ان کی نظر کو کیا کروں

शायर: Hafeez Jalandhari7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उन को जिगर की जुस्तुजू उन की नज़र को क्या करूँ
मुझ को नज़र की आरज़ू अपने जिगर को क्या करूँ

रात ही रात में तमाम तय हुए उम्र के मक़ाम
हो गई ज़िंदगी की शाम अब मैं सहर को क्या करूँ

वहशत-ए-दिल फ़ुज़ूँ तो है हाल मिरा ज़ुबूँ तो है
इश्क़ नहीं जुनूँ तो है उस के असर को क्या करूँ

फ़र्श से मुतमइन नहीं पस्त है ना-पसंद है
अर्श बहुत बुलंद है ज़ौक़-ए-नज़र को क्या करूँ

हाए कोई दवा करो हाए कोई दुआ करो
हाए जिगर में दर्द है हाए जिगर को क्या करूँ

अहल-ए-नज़र कोई नहीं इस लिए ख़ुद-पसंद हूँ
आप ही देखता हूँ मैं अपने हुनर को क्या करूँ

तर्क-ए-तअल्लुक़ात पर गिर गई बर्क़-ए-इल्तिफ़ात
राहगुज़र में मिल गए राहगुज़र को क्या करूँ