उर्दू शायरी · ग़ज़ल

umr bhi kaT gai aur jiya bhi nahin

'उम्र भी कट गई और जिया भी नहीं

عمر بھی کٹ گئی اور جیا بھی نہیں

शायर: Nafas Ambalvi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'उम्र भी कट गई और जिया भी नहीं
ज़िंदगी तुझ से कोई गिला भी नहीं

दर्द जीने की इक लाज़मी शर्त है
और सितम है कि इस की दवा भी नहीं

लौटना ही नहीं था मुझे फिर कभी
वर्ना मुड़-मुड़ के घर देखता भी नहीं

'अक्स को देख कर अपने हैरान हूँ
मेरे कमरे में तो आइना भी नहीं

ज़िंदगी तो कभी जी न पाए मगर
अपने हिस्से में जैसे क़ज़ा भी नहीं

बच के मक़्तल से तो लौट आए मगर
अब कहाँ जाएँगे कुछ पता भी नहीं

लोग इतने बुरे तो नहीं शैख़-जी
आप जैसे मगर पारसा भी नहीं

अपना दिल भी सुलगता शरर है 'नफ़स'
जो जला भी नहीं तो बुझा भी नहीं