उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab tak koi sukun ka manzar nahin mila

अब तक कोई सुकून का मंज़र नहीं मिला

اب تک کوئی سکون کا منظر نہیں ملا

शायर: Nafas Ambalvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब तक कोई सुकून का मंज़र नहीं मिला
सहरा तो थे सफ़र में समुंदर नहीं मिला

अफ़सोस ये नहीं कि क़बा चाक हो गई
है रंज ये कि कोई रफ़ूगर नहीं मिला

दुश्मन नहीं ये सब मिरे अहबाब हैं मगर
किस किस की आस्तीन में ख़ंजर नहीं मिला

इस का मलाल है कि मैं उर्दू हूँ इस लिए
दिल में जगह मिली है मगर घर नहीं मिला

ये रहगुज़र भी जैसे सराबों का दश्त है
अब तक तो कोई मील का पत्थर नहीं मिला

सारे जहाँ की ख़ाक उड़ाने के बा'द भी
मौला तिरे निज़ाम का दफ़्तर नहीं मिला