उर्दू शायरी · ग़ज़ल

uljhanon par uljhanen KHaljaan hai KHaljaan par

उलझनों पर उलझनें ख़लजान है ख़लजान पर

الجھنوں پر الجھنیں خلجان ہے خلجان پر

शायर: Ushba Tabeer9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उलझनों पर उलझनें ख़लजान है ख़लजान पर
आह कितनी आफ़तें हैं हज़रत-ए-इंसान पर

काम फिर करती नहीं है मंतिक़-ओ-तदबीर कुछ
पर्दा जब पड़ जाए तेरी अक़्ल की शिरयान पर

दिल अदावत से भरे हैं पर ज़बाँ शीरीं-सुख़न
इस लिए कुढ़ता है दिल इख़्लास के फ़ुक़्दान पर

धूल सारी उम्र फिर वो चाटता फिरता रहे
मो'तरिज़ हो जाए जब इंसान ही विज्दान पर

ग़स्ब कर जाते हैं अक्सर हक़ किसी मासूम का
लोग मिट्टी डालते हैं इस तरह ईमान पर

हाल में रह कर भी रिश्ता रखते हैं माज़ी के साथ
रश्क आशिक़ इस क़दर करते हैं हर नुक़सान पर

क्यों बसारत की ज़मीं बंजर की बंजर रह गई
दुख है तेरी ज़ात पर तुफ़ है तिरी पहचान पर

पर्बतों पर भी अगर रख दो तो झुक जाएँगे वो
ऐसे ऐसे दर्द भी झेले हैं हम ने जान पर

आज 'उश्बा' लोग मेरी बात क्यों सुनते नहीं
ख़ुद को कोसूँ या कि रोऊँ ऐसे कज-अज़हान पर