उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ubhre jo KHak se wo tah-e-KHak ho gae

उभरे जो ख़ाक से वो तह-ए-ख़ाक हो गए

ابھرے جو خاک سے وہ تہ خاک ہو گئے

शायर: Hafeez Jalandhari5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उभरे जो ख़ाक से वो तह-ए-ख़ाक हो गए
सब पाइमाल-ए-गर्दिश-ए-अफ़्लाक हो गए

रखती थी लाग मेरे गरेबाँ से नौ-बहार
दामन गुलों के बाग़ में क्यूँ चाक हो गए

थे दीदा-हा-ए-ख़ुश्क मोहब्बत की आबरू
कम-बख़्त उन के सामने नमनाक हो गए

ऐसा भी क्या मिज़ाज क़यामत का दिन है आज
पेश-ए-ख़ुदा तुम और भी बेबाक हो गए

आते ही बज़्म-ए-वाज़ से चलते बने 'हफ़ीज़'
दो हर्फ़ सुन के साहिब-ए-इदराक हो गए