उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tumhaari duniya ke bahar andar bhaTak raha hun

तुम्हारी दुनिया के बाहर अंदर भटक रहा हूँ

تمہاری دنیا کے باہر اندر بھٹک رہا ہوں

शायर: Pallav Mishra4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तुम्हारी दुनिया के बाहर अंदर भटक रहा हूँ
मैं बा'द-ए-तर्क-ए-जहाँ यहीं पर भटक रहा हूँ

मैं तुझ से मिलने समय से पहले पहुँच गया था
सो तेरे घर के क़रीब आ के भटक रहा हूँ

मैं एक ख़ाना-ब-दोश हूँ जिस का घर है दुनिया
सो अपने काँधों पे ले के ये घर भटक रहा हूँ

मैं हर क़दम पर सँभल सँभल कर भटकने वाला
भटकने वालों से काफ़ी बेहतर भटक रहा हूँ